
राजकुमार केसरवानी
*बाराकौशाम्बी।* ऐतिहासिक स्थल कौशाम्बी स्थित कौशाम्बेश्वर संकट मोचन आश्रम ट्रस्ट परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का तीसरा दिन श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं की सरिता बनकर बहा। कथा व्यास श्री शंभु दास महाराज जी ने अष्टम स्कंध की दिव्य कथाओं का ऐसा रसपान कराया कि श्रद्धालु क्षण-क्षण भावविभोर होते रहे।कथा की शुरुआत नरक वर्णन से हुई। महाराज जी ने श्रोताओं को बताया कि पाप कर्मों का दुष्परिणाम जीव को नरक के असहनीय कष्टों तक ले जाता है। यह प्रसंग इतना प्रभावशाली था कि पूरा पांडाल मौन साधना और आत्ममंथन में डूब गया।इसके बाद जब अजामिल चरित्र का वर्णन हुआ, तो माहौल एकाएक भक्ति में रंग गया। यह कथा बताती है कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि प्रभु का नाम सच्चे भाव से लिया जाए, तो उद्धार अवश्यंभावी है। इस प्रसंग ने श्रोताओं को नामस्मरण की शक्ति का बोध कराया।
फिर कथा का प्रवाह वामन अवतार की ओर बढ़ा। त्रिविक्रम रूप में भगवान विष्णु ने राजा बली से तीन पग भूमि मांगकर तीनों लोकों को माप लिया। भगवान द्वारा बली को पाताल भेजकर भी उसे सम्मान देना दान, धर्म और विनम्रता की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
कथा का अगला पड़ाव था प्रह्लाद चरित्र और वृत्तासुर प्रसंग, जिसने यह संदेश दिया कि निष्काम भक्ति ही सच्चा बल है। भक्ति यदि दृढ़ और निडर हो, तो भगवान स्वयं रक्षा हेतु प्रकट होते हैं।
सबसे अंत में कथा व्यास ने गजेंद्र मोक्ष की कथा सुनाई, जिसमें गजेंद्र संकट में भगवान विष्णु को पुकारता है और प्रभु तत्काल सुदर्शन चक्र लेकर उसकी रक्षा को आते हैं। यह प्रसंग भगवान और भक्त के अटूट संबंध को दर्शाता है।
कथा के दौरान पूरा पांडाल ‘हरि बोल’ और ‘जय श्रीहरि’ के उद्घोष से गूंजता रहा। भक्तगण भजन-कीर्तन में लीन रहे। इस दौरान आश्रम के संस्थापक बाबा बुद्धनदास महाराज, खत्री बाबा आश्रम महंत जी, शिवाकांत मिश्र उर्फ रज्जन, राजू केशरवानी, कौशिक अग्रहरि, अंकित केशरवानी, अंकुर केशरवानी, अंकित सिंह, संदीप सिंह समेत गांव व क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।


